1 लाख डॉलर की H-1B फीस पर कंपनियों की नई चाल, बदला ये तरीका, विदेशी छात्रों की हुई बल्ले-बल्ले

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अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पिछले साल सितंबर में H-1B वीजा की फीस बढ़ाकर 1 लाख डॉलर कर दी. इस फैसले ने अमेरिकी कंपनियों के लिए विदेशी वर्कर्स को नौकरी पर रखना काफी महंगा बना दिया. पहले जहां कंपनियां आसानी से विदेशी कर्मचारियों को हायर कर लेती थीं, अब उन्हें हर आवेदन पर भारी रकम खर्च करनी पड़ रही है. इस बदलाव का असर पूरे टेक और हेल्थ सेक्टर पर साफ दिखाई दे रहा है.

नई फीस का सबसे ज्यादा असर छोटे स्टार्टअप पर पड़ा है. ये कंपनियां पहले ही सीमित बजट में काम करती हैं. ऐसे में 1 लाख डॉलर की फीस देना उनके लिए आसान नहीं है. खासकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और हेल्थकेयर जैसे क्षेत्रों में काम करने वाली छोटी कंपनियां ज्यादा परेशानी में हैं. इन क्षेत्रों में खास स्किल वाले विदेशी कर्मचारियों की जरूरत होती है. लेकिन अब ऊंची फीस की वजह से वे H-1B वीजा के जरिए भर्ती करने से बच रही हैं.

बड़ी टेक कंपनियों ने निकाला रास्ता

रिपोर्ट्स के अनुसार दूसरी ओर अमेजन, माइक्रोसॉफ्ट और गूगल जैसी बड़ी टेक कंपनियां इस फीस को देने की क्षमता तो रखती हैं, लेकिन वे भी अब नए तरीके अपना रही हैं. रिपोर्ट के अनुसार, ये कंपनियां सीधे H-1B वीजा पर निर्भर रहने के बजाय दूसरा रास्ता अपना रही हैं. इससे उन्हें फीस देने से बचत भी हो रही है और काम भी चलता रहता है.

H-1B वीजा में हुए नए बदलाव

अमेरिका में हर साल 85 हजार नए H-1B वीजा जारी किए जाते हैं. इनमें से 20 हजार वीजा उन विदेशी छात्रों के लिए सुरक्षित होते हैं, जिन्होंने अमेरिकी यूनिवर्सिटी से मास्टर्स या उससे ऊपर की डिग्री ली हो. पहले इस वीजा के लिए लॉटरी सिस्टम अपनाया जाता था, यानी किसे वीजा मिलेगा यह किस्मत पर निर्भर करता था.

अब सरकार ने इस सिस्टम में भी बदलाव किया है. नई व्यवस्था के तहत उन लोगों को प्राथमिकता दी जाएगी, जिनकी सैलरी ज्यादा है. इसका सीधा फायदा बड़ी कंपनियों को मिलेगा, क्योंकि वे आम तौर पर ज्यादा वेतन देती हैं. इससे ऊंची सैलरी पाने वाले उम्मीदवारों के लिए वीजा पाना पहले से आसान हो सकता है.

विदेशी छात्रों के लिए नया मौका

इन बदलावों के बीच अमेरिका में पढ़ने वाले विदेशी छात्रों के लिए अच्छी खबर है. वहां पढ़ाई पूरी करने के बाद छात्रों को ‘ऑप्शनल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग’ यानी OPT के तहत 12 महीने तक काम करने की इजाजत मिलती है. अगर छात्र ने साइंस, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग या मैथ्स यानी STEM कोर्स किया है, तो उसे तीन साल तक काम करने का मौका मिलता है.

अब बड़ी टेक कंपनियां H-1B वीजा की बजाय ऐसे छात्रों को सीधे नौकरी पर रख रही हैं. इससे कंपनी को वीजा फीस नहीं देनी पड़ती और छात्र को अमेरिका में काम का अनुभव मिल जाता है. तीन साल तक नौकरी करने के दौरान कंपनी आगे की योजना भी बना सकती है.

ऊंची सैलरी वालों को प्राथमिकता

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर बड़ी कंपनी किसी कर्मचारी के लिए H-1B वीजा स्पांसर करती भी है, तो उसके लिए वीजा मिलने की संभावना ज्यादा रहती है. नई नीति के तहत ज्यादा सैलरी पाने वालों को प्राथमिकता दी जा रही है. बड़ी कंपनियां आम तौर पर बेहतर वेतन देती हैं, इसलिए उनके उम्मीदवार आगे रह सकते हैं.

विदेश में भी नौकरी का विकल्प

बड़ी टेक कंपनियों के पास एक और विकल्प है. अगर किसी कर्मचारी को अमेरिका में बुलाना मुश्किल हो, तो वे उसे अपने दूसरे देशों में मौजूद दफ्तरों में भी काम दे सकती हैं. इस तरह कंपनी का काम भी चलता रहता है और वीजा की बाधा भी कम हो जाती है.

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